कृष्ण कहते हैं — सुख-दुख को, लाभ-हानि को, जय-पराजय को समान मानकर युद्ध करो। ऐसा करने से तुम्हें कोई पाप नहीं लगेगा।
यह समत्व (समान भाव) गीता की सबसे महत्वपूर्ण शिक्षाओं में से एक है। जब हम किसी काम को न सुख के लालच से करते हैं, न दुख के डर से — तब वह कर्म शुद्ध हो जाता है।
जैसे एक अच्छा खिलाड़ी मैच खेलते समय न जीत के बारे में सोचता है न हार के — वह बस अपना सर्वश्रेष्ठ खेल खेलता है। कृष्ण अर्जुन से यही कह रहे हैं।