📿 श्लोक संग्रह

यदृच्छया चोपपन्नम्

गीता 2.32 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् ।
सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ॥
यदृच्छया
अपने आप, बिना माँगे
उपपन्नम्
प्राप्त हुआ
स्वर्गद्वारम्
स्वर्ग का द्वार
अपावृतम्
खुला हुआ
सुखिनः क्षत्रियाः
भाग्यशाली क्षत्रिय
पार्थ
हे पार्थ
लभन्ते
पाते हैं
युद्धम् ईदृशम्
इस प्रकार का युद्ध

कृष्ण अब क्षत्रिय-धर्म की दृष्टि से अर्जुन को समझाते हैं। वे कहते हैं — हे पार्थ, जो क्षत्रिय अनायास ही ऐसा युद्ध पाते हैं जो स्वर्ग का खुला द्वार है — वे सुखी हैं। यह युद्ध माँगने पर नहीं मिला — यह स्वयं अर्जुन के द्वार पर आया है।

कृष्ण याद दिला रहे हैं कि धर्मयुद्ध एक अवसर है। जैसे एक शिक्षक के लिए सही समय पर सही छात्र मिलना अवसर है — वैसे ही क्षत्रिय के लिए धर्म की रक्षा का यह युद्ध एक दुर्लभ अवसर है।

भगवद्गीता में यह श्लोक 2.31 के बाद आता है जहाँ कृष्ण ने स्वधर्म की बात की थी। अब वे बताते हैं कि यह युद्ध क्षत्रिय-धर्म के अनुसार कर्तव्य है।

यहाँ 'अपावृत' — खुला हुआ — शब्द सुंदर है। द्वार खुला है, प्रवेश करना है या नहीं — यह अर्जुन पर निर्भर है।

अध्याय 2 · 32 / 72
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