कृष्ण अब आत्मा के दर्शन से स्वधर्म (कर्तव्य) की बात पर आते हैं। वे कहते हैं — अपने कर्तव्य को देखते हुए भी तुम्हें डगमगाना नहीं चाहिए। एक क्षत्रिय के लिए धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर कोई कर्तव्य नहीं है।
हर व्यक्ति का अपना कर्तव्य होता है — शिक्षक का कर्तव्य पढ़ाना है, डॉक्टर का इलाज करना, किसान का खेती। अर्जुन एक योद्धा हैं — उनका कर्तव्य अन्याय के विरुद्ध लड़ना है।
कृष्ण यह नहीं कह रहे कि हिंसा अच्छी है। वे कह रहे हैं कि जब अन्याय सामने हो और आपका कर्तव्य उसका विरोध करना हो, तो पीछे हटना उचित नहीं।