📿 श्लोक संग्रह

देही नित्यमवध्योऽयम्

गीता 2.30 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत ।
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ॥
देही
देहधारी आत्मा
नित्यम्
सदा
अवध्यः
अवध्य, न मारा जाने वाला
देहे सर्वस्य
सबके शरीर में
भारत
हे भारतवंशी
तस्मात्
इसलिए
सर्वाणि भूतानि
सभी प्राणियों के लिए
न शोचितुम् अर्हसि
शोक करना उचित नहीं

कृष्ण आत्मा संबंधी उपदेश का निष्कर्ष देते हुए कहते हैं — हे भारत, सभी प्राणियों के शरीर में यह देही (आत्मा) सदा अवध्य है — इसलिए तुम्हें किसी भी प्राणी के लिए शोक करना उचित नहीं। यह आत्मा के अध्याय का समापन बिंदु है।

यह 'सर्वाणि भूतानि' — सभी प्राणियों में — बहुत व्यापक है। केवल मनुष्यों में नहीं, बल्कि पशु-पक्षी सहित सब जीवों में वही आत्मा है। इसीलिए किसी के मरने पर शोक का कारण नहीं — आत्मा तो है ही।

भगवद्गीता में यह श्लोक अध्याय 2 के सांख्य-उपदेश का समापन करता है। 2.11 से शुरू हुई आत्मा की चर्चा यहाँ 2.30 पर अपना निष्कर्ष पाती है।

इसके बाद कृष्ण क्षत्रिय-धर्म की बात करेंगे — यानी 2.31 से एक नया कोण आरंभ होगा।

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