📿 श्लोक संग्रह

आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनम्

गीता 2.29 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनमाश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः ।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ॥
आश्चर्यवत् पश्यति
अद्भुत की तरह देखता है
कश्चित् एनम्
कोई इसे (आत्मा को)
आश्चर्यवत् वदति
अद्भुत की तरह बताता है
अन्यः
दूसरा
शृणोति
सुनता है
श्रुत्वा अपि
सुनकर भी
वेद न
नहीं जानता
कश्चित्
कोई भी नहीं

कृष्ण कहते हैं — कोई इस आत्मा को अद्भुत की तरह देखता है, कोई अद्भुत की तरह बताता है, कोई अद्भुत की तरह सुनता है — और सुनकर भी कोई इसे पूरी तरह नहीं जान पाता। आत्मा की यह अबूझ प्रकृति ही उसे महान बनाती है।

यह बात हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में भी लागू होती है। आकाश के बारे में बच्चा सोचे, वैज्ञानिक पढ़े, दार्शनिक चर्चा करे — फिर भी आकाश की पूरी थाह किसी को नहीं मिलती। आत्मा भी ऐसी ही है।

भगवद्गीता का यह श्लोक कठोपनिषद् के एक विचार की प्रतिध्वनि करता है जहाँ यमराज नचिकेता से कहते हैं कि आत्मा का ज्ञान दुर्लभ है।

यहाँ कृष्ण विनम्रता से स्वीकार करते हैं कि आत्मा की पूर्ण अनुभव-जानकारी असाधारण है — जो इसे जानता है, वह वास्तव में दुर्लभ है।

अध्याय 2 · 29 / 72
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