📿 श्लोक संग्रह

अव्यक्तादीनि भूतानि

गीता 2.28 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत ।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥
अव्यक्तादीनि
अव्यक्त आरंभ वाले
भूतानि
प्राणी, जीव
व्यक्तमध्यानि
बीच में व्यक्त (दृश्य)
भारत
हे भारतवंशी
अव्यक्तनिधनानि
अव्यक्त अंत वाले
एव
ही
तत्र का परिदेवना
उसमें क्या शोक

कृष्ण कहते हैं — हे भारत, सभी प्राणियों का आरंभ अव्यक्त (न दिखने वाला) है, बीच का काल व्यक्त (दिखने वाला) है, और अंत भी अव्यक्त है। तो फिर इसमें शोक कैसा? जन्म से पहले हम कहाँ थे — पता नहीं। मृत्यु के बाद कहाँ जाएँगे — पता नहीं। बीच में थोड़े समय के लिए दिखते हैं।

यह तर्क बहुत सरल और सुंदर है। जैसे बादल आसमान में कहीं से आते हैं और कहीं चले जाते हैं — वैसे ही जीव का यात्रा-काल है यह संसार। बीच के काल के लिए शोक क्यों करना?

भगवद्गीता में यह श्लोक जन्म-मृत्यु के चक्र को एक सरल प्राकृतिक प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत करता है।

'परिदेवना' शब्द का अर्थ है विलाप, रोना-पीटना। कृष्ण पूछते हैं — जो इस अव्यक्त-व्यक्त-अव्यक्त की प्रक्रिया को समझता है, उसके लिए विलाप का कोई कारण नहीं।

अध्याय 2 · 28 / 72
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