कृष्ण कहते हैं — हे भारत, सभी प्राणियों का आरंभ अव्यक्त (न दिखने वाला) है, बीच का काल व्यक्त (दिखने वाला) है, और अंत भी अव्यक्त है। तो फिर इसमें शोक कैसा? जन्म से पहले हम कहाँ थे — पता नहीं। मृत्यु के बाद कहाँ जाएँगे — पता नहीं। बीच में थोड़े समय के लिए दिखते हैं।
यह तर्क बहुत सरल और सुंदर है। जैसे बादल आसमान में कहीं से आते हैं और कहीं चले जाते हैं — वैसे ही जीव का यात्रा-काल है यह संसार। बीच के काल के लिए शोक क्यों करना?