📿 श्लोक संग्रह

अथ चैनं नित्यजातम्

गीता 2.26 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् ।
तथापि त्वं महाबाहो नैनं शोचितुमर्हसि ॥
अथ च
और यदि
एनम्
इसे (आत्मा को)
नित्यजातम्
नित्य जन्म लेने वाला
नित्यम् मृतम्
नित्य मरने वाला
मन्यसे
मानते हो
तथापि
तब भी
महाबाहो
हे महाबाहु
न शोचितुम् अर्हसि
शोक करना उचित नहीं

कृष्ण यहाँ एक दूसरा तर्क देते हैं। वे कहते हैं — यदि तुम इसे नित्य जन्मने और नित्य मरने वाला भी मानो, हे महाबाहु, तब भी इसके लिए शोक करना उचित नहीं है। यह तर्क उन लोगों के लिए है जो आत्मा की अमरता को स्वीकार नहीं करते।

कृष्ण कह रहे हैं — चाहे कोई भी दर्शन मानो, शोक तो व्यर्थ है ही। यदि जन्म-मृत्यु नित्य प्रक्रिया है, तो फिर किसी एक मृत्यु के लिए इतना शोक क्यों? यह तर्क बहुत व्यावहारिक है।

भगवद्गीता में यह श्लोक कृष्ण की तार्किक गहराई को दर्शाता है। वे एक ही बात को दो कोणों से सिद्ध करते हैं — पहले आत्मा की अमरता से, और अब यह मानकर भी कि जन्म-मृत्यु नित्य हैं।

इस प्रकार कृष्ण किसी भी दार्शनिक मत के मानने वाले को शोक छोड़ने की प्रेरणा देते हैं।

अध्याय 2 · 26 / 72
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