कृष्ण कहते हैं — यह आत्मा अव्यक्त है, अचिन्त्य है, अविकारी है — ऐसा कहा जाता है। इसलिए इसे ऐसा जानकर तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए। 'अव्यक्त' — जिसे इंद्रियों से न देखा जा सके। 'अचिन्त्य' — जिसे बुद्धि से पूरी तरह न सोचा जा सके।
यह श्लोक बताता है कि आत्मा की सीमा हमारी समझ की सीमा से परे है। जैसे सूरज की रोशनी से आँखें चुँधियाती हैं पर सूरज मौजूद है — वैसे ही आत्मा इंद्रियों की पहुँच से परे है, फिर भी है।