📿 श्लोक संग्रह

अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयम्

गीता 2.25 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते ।
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ॥
अव्यक्तः
अव्यक्त, जो देखा न जाए
अचिन्त्यः
जिसे सोचा न जा सके
अविकार्यः
जिसमें परिवर्तन न हो
उच्यते
कहा जाता है
तस्मात्
इसलिए
एवम् विदित्वा
ऐसा जानकर
न अनुशोचितुम् अर्हसि
शोक करना उचित नहीं

कृष्ण कहते हैं — यह आत्मा अव्यक्त है, अचिन्त्य है, अविकारी है — ऐसा कहा जाता है। इसलिए इसे ऐसा जानकर तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए। 'अव्यक्त' — जिसे इंद्रियों से न देखा जा सके। 'अचिन्त्य' — जिसे बुद्धि से पूरी तरह न सोचा जा सके।

यह श्लोक बताता है कि आत्मा की सीमा हमारी समझ की सीमा से परे है। जैसे सूरज की रोशनी से आँखें चुँधियाती हैं पर सूरज मौजूद है — वैसे ही आत्मा इंद्रियों की पहुँच से परे है, फिर भी है।

भगवद्गीता के अनुसार 2.24 में आत्मा की अविनाशिता बताई गई, अब 2.25 में उसकी अतींद्रिय प्रकृति बताई जा रही है। दोनों मिलकर एक पूर्ण चित्र बनाते हैं।

यहाँ 'एवं विदित्वा' — ऐसा जानकर — यह दर्शाता है कि ज्ञान से शोक दूर होता है। अज्ञान ही शोक का मूल कारण है।

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