📿 श्लोक संग्रह

अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयम्

गीता 2.24 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च ।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥
अच्छेद्यः
न काटा जा सके
अदाह्यः
न जलाया जा सके
अक्लेद्यः
न भिगोया जा सके
अशोष्यः
न सुखाया जा सके
नित्यः
नित्य
सर्वगतः
सर्वव्यापी
स्थाणुः
स्थिर, अटल
अचलः
गतिहीन, अविचल
सनातनः
प्राचीन, सनातन

कृष्ण आत्मा के स्वरूप का वर्णन करते हुए कहते हैं — यह न काटी जा सकती, न जलाई, न भिगोई, न सुखाई। यह नित्य है, सर्वव्यापी है, स्थिर है, अविचल है और सनातन है। चारों तत्वों — पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु — में से कोई भी आत्मा को नष्ट नहीं कर सकता।

यह श्लोक बच्चों को भी आसानी से समझाया जा सकता है। जैसे हवा को पकड़ा नहीं जा सकता, आग उसे जला नहीं सकती — वैसे ही आत्मा किसी भी भौतिक शक्ति की पहुँच से परे है।

भगवद्गीता का यह श्लोक 2.23 के बाद आता है जहाँ पहले कहा गया था कि शस्त्र इसे नहीं काट सकते, अग्नि नहीं जला सकती, जल नहीं भिगो सकता, वायु नहीं सुखा सकती। यह श्लोक उसी का विस्तार और पुष्टि है।

'सनातन' शब्द — जो सदा से है, जो सदा रहेगा — आत्मा के लिए यहाँ प्रयुक्त है। यही शब्द 'सनातन धर्म' में भी आता है।

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