कृष्ण कहते हैं — नित्य, अनाशी और अप्रमेय आत्मा के ये शरीर नाशवान कहे गए हैं। इसलिए हे भारत, युद्ध करो। यह तर्क सीधा और स्पष्ट है — शरीर का नाश होता है लेकिन आत्मा का नहीं, तो शरीर के लिए शोक क्यों?
'अप्रमेय' शब्द बहुत सुंदर है — जिसे किसी भी प्रमाण से मापा न जा सके। आत्मा इतनी सूक्ष्म और व्यापक है कि उसे किसी यंत्र या तर्क से नापना असंभव है। इसलिए उसका कोई अंत भी नहीं।