📿 श्लोक संग्रह

अन्तवन्त इमे देहाः

गीता 2.18 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः ।
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ॥
अन्तवन्तः
नाशवान, अंत वाले
इमे देहाः
ये शरीर
नित्यस्य
नित्य के
शरीरिणः
देहधारी आत्मा के
अनाशिनः
अविनाशी
अप्रमेयस्य
अप्रमेय (जिसे नापा न जा सके)
तस्मात्
इसलिए
युध्यस्व
युद्ध करो
भारत
हे भारतवंशी (अर्जुन)

कृष्ण कहते हैं — नित्य, अनाशी और अप्रमेय आत्मा के ये शरीर नाशवान कहे गए हैं। इसलिए हे भारत, युद्ध करो। यह तर्क सीधा और स्पष्ट है — शरीर का नाश होता है लेकिन आत्मा का नहीं, तो शरीर के लिए शोक क्यों?

'अप्रमेय' शब्द बहुत सुंदर है — जिसे किसी भी प्रमाण से मापा न जा सके। आत्मा इतनी सूक्ष्म और व्यापक है कि उसे किसी यंत्र या तर्क से नापना असंभव है। इसलिए उसका कोई अंत भी नहीं।

भगवद्गीता के अनुसार यह श्लोक 2.17 के तर्क का विस्तार है। पहले बताया कि आत्मा अविनाशी है, अब बताते हैं कि शरीर अंत वाला है — और इसीलिए शोक करने की ज़रूरत नहीं।

यहाँ 'युध्यस्व' — युद्ध करो — सिर्फ़ कुरुक्षेत्र के युद्ध के लिए नहीं। यह हर उस कर्तव्य का प्रतीक है जिसे हम टालते हैं क्योंकि हम शरीर और संबंधों की चिंता में डूबे हैं।

अध्याय 2 · 18 / 72
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