कृष्ण कहते हैं — जो इस पूरे जगत में व्याप्त है, उसे अविनाशी जानो। उस अव्यय तत्व का विनाश कोई नहीं कर सकता।
जैसे आकाश सर्वत्र व्याप्त है — हर घर में, हर कमरे में, हर बर्तन में — लेकिन कोई आकाश को तोड़ नहीं सकता, काट नहीं सकता। वैसे ही आत्मा सर्वव्यापी है और उसका नाश असंभव है।
यह श्लोक हमें बताता है कि जो सबसे बड़ा सत्य है — आत्मा — वह किसी शस्त्र से, किसी शक्ति से नष्ट नहीं किया जा सकता। यही बात आगे गीता 2.23 में और स्पष्ट की गई है।