📿 श्लोक संग्रह

नासतो विद्यते भावः

गीता 2.16 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः ।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ॥
न असतः
असत् का
विद्यते भावः
अस्तित्व नहीं
न अभावः
अभाव नहीं
विद्यते सतः
सत् का
उभयोः
दोनों का
दृष्टः अन्तः
अंत-निर्णय देखा गया
तत्त्वदर्शिभिः
तत्व को देखने वालों द्वारा

कृष्ण कहते हैं — जो असत् है उसकी कोई सत्ता नहीं; जो सत् है उसका कोई अभाव नहीं। इन दोनों का यह निष्कर्ष तत्वदर्शियों ने देखा है। यह गीता के सबसे गहरे दार्शनिक वचनों में से एक है।

आसान शब्दों में — शरीर बदलता है, इसलिए वह असत् है; आत्मा कभी नहीं बदलती इसलिए वह सत् है। शरीर के नाश का शोक नहीं करना चाहिए क्योंकि जो सच में है — वह कभी नष्ट नहीं होता।

भगवद्गीता के अनुसार यह श्लोक सांख्य-दर्शन की नींव पर खड़ा है। 'सत्' और 'असत्' की यह व्याख्या उपनिषदों से आती है।

'तत्त्वदर्शी' — तत्व को देखने वाले — वे ऋषि और ज्ञानी हैं जिन्होंने आत्मा और शरीर के भेद को साक्षात जाना। कृष्ण उनके अनुभव को यहाँ प्रमाण के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

अध्याय 2 · 16 / 72
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