📿 श्लोक संग्रह

अविनाशि तु तद्विद्धि

गीता 2.17 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् ।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ॥
अविनाशि
अविनाशी
तु
निश्चय ही
तत्
उसे
विद्धि
जानो
येन
जिससे
सर्वम् इदम्
यह सब
ततम्
व्याप्त है
विनाशम्
विनाश
अव्ययस्य
अव्यय (अविनाशी) का
न कश्चित्
कोई नहीं
कर्तुम् अर्हति
कर सकता

कृष्ण कहते हैं — जो इस पूरे जगत में व्याप्त है, उसे अविनाशी जानो। उस अव्यय तत्व का विनाश कोई नहीं कर सकता।

जैसे आकाश सर्वत्र व्याप्त है — हर घर में, हर कमरे में, हर बर्तन में — लेकिन कोई आकाश को तोड़ नहीं सकता, काट नहीं सकता। वैसे ही आत्मा सर्वव्यापी है और उसका नाश असंभव है।

यह श्लोक हमें बताता है कि जो सबसे बड़ा सत्य है — आत्मा — वह किसी शस्त्र से, किसी शक्ति से नष्ट नहीं किया जा सकता। यही बात आगे गीता 2.23 में और स्पष्ट की गई है।

यह श्लोक आत्मा के स्वरूप की व्याख्या में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। 2.12 में बताया कि आत्मा सदा थी, 2.13 में बताया कि शरीर बदलता है, और अब 2.17 में बताया कि आत्मा सर्वव्यापी और अविनाशी है।

शंकराचार्य ने इस श्लोक की व्याख्या में कहा है कि 'ततम्' शब्द आत्मा की सर्वव्यापकता को दर्शाता है।

अध्याय 2 · 17 / 72
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