📿 श्लोक संग्रह

यं हि न व्यथयन्त्येते

गीता 2.15 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥
यम्
जिसे
न व्यथयन्ति
व्यथित नहीं करते
एते
ये (सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख)
पुरुषम्
पुरुष को
पुरुषर्षभ
हे पुरुषों में श्रेष्ठ
समदुःखसुखम्
दुःख-सुख में समान
धीरम्
धीर, स्थिरचित्त
सः अमृतत्वाय कल्पते
वह अमरता के योग्य है

कृष्ण कहते हैं — हे पुरुषों में श्रेष्ठ, जिस पुरुष को ये सुख-दुःख की स्पर्श-संवेदनाएँ व्यथित नहीं करतीं, जो दुःख और सुख में समान रहता है — वह धीर पुरुष अमरता का अधिकारी है। यह ऊँचा लक्ष्य है, लेकिन कृष्ण इसे साध्य मानते हैं।

यहाँ 'धीर' शब्द महत्वपूर्ण है। धीर वह है जो जानता है कि सुख-दुःख आते-जाते रहते हैं। जैसे नदी के किनारे खड़ा पत्थर पानी की लहरों से डिगता नहीं — वैसे ही धीर पुरुष जीवन की लहरों में अडिग रहता है।

भगवद्गीता के अनुसार यह श्लोक 2.14 के बाद आता है जहाँ कृष्ण ने कहा था कि सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख आने-जाने वाले हैं — उन्हें सहन करो। यहाँ वे बताते हैं कि ऐसा करने वाला ही अमरता का पात्र है।

अमरत्व से यहाँ आत्मा की शाश्वत प्रकृति की पहचान मिलती है — यह शरीर की अमरता नहीं बल्कि उस स्थिति को पाना है जहाँ जन्म-मृत्यु का चक्र समाप्त हो।

अध्याय 2 · 15 / 72
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