कृष्ण कहते हैं — हे पुरुषों में श्रेष्ठ, जिस पुरुष को ये सुख-दुःख की स्पर्श-संवेदनाएँ व्यथित नहीं करतीं, जो दुःख और सुख में समान रहता है — वह धीर पुरुष अमरता का अधिकारी है। यह ऊँचा लक्ष्य है, लेकिन कृष्ण इसे साध्य मानते हैं।
यहाँ 'धीर' शब्द महत्वपूर्ण है। धीर वह है जो जानता है कि सुख-दुःख आते-जाते रहते हैं। जैसे नदी के किनारे खड़ा पत्थर पानी की लहरों से डिगता नहीं — वैसे ही धीर पुरुष जीवन की लहरों में अडिग रहता है।