📿 श्लोक संग्रह

न त्वेवाहं जातु नासं

गीता 2.12 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः ।
न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ॥
न तु एव
ऐसा नहीं है कि
अहम्
मैं
जातु
कभी
न आसम्
नहीं था
न त्वम्
न तुम
न इमे
न ये
जनाधिपाः
राजा लोग
न च एव न भविष्यामः
और ऐसा भी नहीं कि हम आगे नहीं रहेंगे
अतः परम्
इसके बाद भी

कृष्ण कह रहे हैं कि ऐसा मत सोचो कि मैं पहले नहीं था, या तुम पहले नहीं थे, या ये सब राजा पहले नहीं थे। हम सब पहले भी थे और आगे भी रहेंगे। आत्मा का अस्तित्व शाश्वत है।

जैसे नदी का पानी बहता रहता है — कभी यहाँ है, कभी वहाँ — लेकिन नदी सदा रहती है। वैसे ही शरीर बदलते हैं, लेकिन आत्मा सदा रहती है।

यह श्लोक अर्जुन के शोक का सीधा उत्तर है — जिनके मरने से तुम डरते हो, वे मर ही नहीं सकते। उनकी आत्मा अमर है।

कृष्ण यहाँ आत्मा की नित्यता का सिद्धांत स्थापित कर रहे हैं। यह गीता के दर्शन की नींव है — यदि आत्मा शाश्वत है, तो शरीर के नाश का शोक व्यर्थ है।

इस श्लोक से सांख्ययोग का मूल तत्व — आत्मा और शरीर का भेद — स्पष्ट होने लगता है।

अध्याय 2 · 12 / 72
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