📿 श्लोक संग्रह

देहिनोऽस्मिन्यथा देहे

गीता 2.13 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥
देहिनः
देह धारण करने वाले (आत्मा) को
अस्मिन् देहे
इस शरीर में
यथा
जैसे
कौमारम्
बालपन
यौवनम्
जवानी
जरा
बुढ़ापा
तथा
वैसे ही
देहान्तरप्राप्तिः
दूसरे शरीर की प्राप्ति
धीरः
धैर्यवान
न मुह्यति
मोह में नहीं पड़ता

कृष्ण एक बहुत सुंदर उदाहरण देते हैं — जैसे एक ही शरीर में बचपन आता है, फिर जवानी आती है, फिर बुढ़ापा — इसी तरह मृत्यु के बाद आत्मा को नया शरीर मिलता है। जो समझदार है, वह इसमें घबराता नहीं।

सोचिए — एक बच्चा जब बड़ा होता है तो क्या वह 'मर' जाता है? नहीं, वही आत्मा है, बस शरीर बदल गया। वैसे ही मृत्यु में भी शरीर बदलता है, आत्मा नहीं।

यह श्लोक हमें सिखाता है कि बदलाव प्रकृति का नियम है। जो धीर है — अर्थात जिसने इस सत्य को समझ लिया है — वह शोक नहीं करता।

यह श्लोक आत्मा की अमरता को समझाने का सबसे सरल तरीका प्रस्तुत करता है। बालपन से बुढ़ापे तक का दृष्टांत हर व्यक्ति के अनुभव से मेल खाता है।

गीता 2.22 (वासांसि जीर्णानि) में इसी विचार को वस्त्र बदलने के दृष्टांत से और स्पष्ट किया गया है।

अध्याय 2 · 13 / 72
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