यह श्लोक भगवद्गीता में कृष्ण के उपदेश का आरंभ है। अर्जुन युद्धभूमि में अपने प्रियजनों को देखकर शोक से भर गए हैं। कृष्ण कहते हैं — तुम ऐसे लोगों के लिए शोक कर रहे हो जो शोक करने योग्य नहीं हैं, और साथ ही पंडितों जैसी बातें भी कर रहे हो।
कृष्ण का कहना है कि जो सच में ज्ञानी हैं, वे न तो मरे हुओं के लिए शोक करते हैं और न जीवितों के लिए। क्योंकि आत्मा अमर है — शरीर बदलता है, लेकिन जो भीतर है वह कभी नष्ट नहीं होता।
यह ऐसा है जैसे कोई बच्चा अपने पुराने कपड़े बदलकर नए पहनता है — पुराने कपड़ों के जाने पर कोई रोता नहीं। वैसे ही शरीर बदलता है लेकिन आत्मा वही रहती है।