📿 श्लोक संग्रह

दुःखमित्येव यत्

गीता 18.8 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् ।
स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् ॥
दुःखम् इति एव
यह दुःखदायी है — ऐसा मानकर
कायक्लेशभयात्
शरीर-कष्ट के भय से
त्यजेत्
छोड़ दे
राजसम्
राजस — रजोगुण से युक्त
त्यागफलम्
त्याग का फल
न एव लभेत्
नहीं पाता

भगवान कहते हैं — जो व्यक्ति यह सोचकर कर्म छोड़ता है कि 'यह बहुत कठिन है, इसमें तकलीफ है' — वह राजस त्याग करता है। ऐसे त्याग का कोई फल नहीं मिलता।

राजस त्याग में इंसान कर्म तो छोड़ता है, पर कारण है — शरीर की तकलीफ से बचना। यह स्वार्थ-प्रेरित निर्णय है। गीता कहती है — ऐसे त्याग से न मुक्ति मिलती है, न शांति।

राजस त्याग — तामस त्याग से थोड़ा ऊपर है, पर सात्त्विक नहीं। इसमें कम से कम सोच-समझ है, पर कारण गलत है।

कर्म छोड़ने का सही कारण कभी शरीर का आराम नहीं होता। सही कारण होता है — भगवान की सेवा में समर्पण, या संसार से वैराग्य की पक्की समझ।

अध्याय 18 · 8 / 78
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