भगवान कहते हैं — जो व्यक्ति यह सोचकर कर्म छोड़ता है कि 'यह बहुत कठिन है, इसमें तकलीफ है' — वह राजस त्याग करता है। ऐसे त्याग का कोई फल नहीं मिलता।
राजस त्याग में इंसान कर्म तो छोड़ता है, पर कारण है — शरीर की तकलीफ से बचना। यह स्वार्थ-प्रेरित निर्णय है। गीता कहती है — ऐसे त्याग से न मुक्ति मिलती है, न शांति।