भगवान कहते हैं — नित्य कर्मों का त्याग उचित नहीं। जो कर्म हमें करने ही चाहिए — परिवार की देखभाल, समाज के प्रति दायित्व — उन्हें भ्रम या थकान से छोड़ना तामस त्याग है।
तामस त्याग वह है जहाँ इंसान कहता है — 'मेरा जी नहीं चाहता, इसलिए नहीं करूँगा।' यह आलस और मोह से उपजा निर्णय है। गीता ऐसे त्याग की निंदा करती है।