📿 श्लोक संग्रह

नियतस्य तु संन्यासः

गीता 18.7 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते ।
मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः ॥
नियतस्य
नित्य कर्म का — नियत कर्तव्य का
संन्यासः
त्याग — छोड़ना
नोपपद्यते
उचित नहीं — योग्य नहीं
मोहात्
मोह से — भ्रम से
परित्यागः
पूर्णतः त्याग
तामसः
तामस — तमोगुण से युक्त

भगवान कहते हैं — नित्य कर्मों का त्याग उचित नहीं। जो कर्म हमें करने ही चाहिए — परिवार की देखभाल, समाज के प्रति दायित्व — उन्हें भ्रम या थकान से छोड़ना तामस त्याग है।

तामस त्याग वह है जहाँ इंसान कहता है — 'मेरा जी नहीं चाहता, इसलिए नहीं करूँगा।' यह आलस और मोह से उपजा निर्णय है। गीता ऐसे त्याग की निंदा करती है।

नित्य कर्म वे होते हैं जो जीवन की प्रकृति से उत्पन्न होते हैं — श्वास लेना, परिवार का पालन करना, अपने धर्म का पालन करना।

तीन प्रकार के त्याग में यह पहला — तामस त्याग — सबसे निम्न श्रेणी का है। आगे राजस और सात्त्विक त्याग का वर्णन आएगा।

अध्याय 18 · 7 / 78
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