📿 श्लोक संग्रह

एतान्यपि तु कर्माणि

गीता 18.6 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च ।
कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् ॥
एतानि अपि
इन्हें भी — इन कर्मों को भी
सङ्गम् त्यक्त्वा
आसक्ति छोड़ कर
फलानि च
और फलों को भी
कर्तव्यानि
करने योग्य हैं — कर्तव्य हैं
निश्चितम्
निश्चित — दृढ़
मतम् उत्तमम्
श्रेष्ठ मत — उत्तम विचार

भगवान कहते हैं — यज्ञ, दान, तप — इन्हें करो, पर आसक्ति और फल की चाहत छोड़ कर। यह मेरा निश्चित और श्रेष्ठ मत है। कर्म का होना जरूरी है, पर फल की लालसा का न होना जरूरी है।

यह श्लोक गीता की 'निष्काम कर्म' की शिक्षा का सार है। अच्छे काम करते रहो — यज्ञ करो, दान करो, तप करो — पर यह न सोचो कि इसके बदले में मुझे क्या मिलेगा।

गीता के तीसरे अध्याय में निष्काम कर्म का उपदेश दिया गया था। यहाँ अठारहवें अध्याय में वही उपदेश और दृढ़ता से दोहराया गया है।

भगवान ने 'उत्तमम्' शब्द का उपयोग किया है — यह मेरा श्रेष्ठ मत है। यह दर्शाता है कि गीता में यही सबसे महत्वपूर्ण शिक्षा है।

अध्याय 18 · 6 / 78
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