📿 श्लोक संग्रह

तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य

गीता 18.77 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः ।
विस्मयो मे महान्राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः ॥
तत् च
उसे भी
संस्मृत्य संस्मृत्य
बार-बार याद करके
रूपम् अति अद्भुतम्
उस महा-अद्भुत रूप को
हरेः
हरि (कृष्ण) के
विस्मयः मे महान्
मुझे महान् आश्चर्य होता है
हृष्यामि पुनः पुनः
बार-बार आनंदित होता हूँ

संजय कहते हैं — हे राजन, उस हरि के महा-अद्भुत रूप को भी बार-बार याद करके मुझे महान् आश्चर्य होता है और बार-बार आनंद मिलता है।

यहाँ 'रूपमत्यद्भुतम्' — विराट-रूप की याद है। ग्यारहवें अध्याय में भगवान ने वह विराट-रूप दिखाया था। उसकी स्मृति मात्र से संजय रोमांचित हो जाते हैं।

18.76 में संवाद की स्मृति से आनंद था। 18.77 में रूप की स्मृति से आनंद है। दोनों मिलकर पूर्ण गीता-अनुभव हैं — ज्ञान और दर्शन।

'पुनः पुनः' — बार-बार। यह शब्द दर्शाता है कि यह आनंद एक क्षण का नहीं — यह आध्यात्मिक आनंद की स्थायी धारा है।

अध्याय 18 · 77 / 78
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