📿 श्लोक संग्रह

राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य

गीता 18.76 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम् ।
केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः ॥
राजन्
हे राजन — हे धृतराष्ट्र
संस्मृत्य संस्मृत्य
बार-बार याद करके
इमम् अद्भुतम् संवादम्
इस अद्भुत संवाद को
केशवार्जुनयोः
केशव और अर्जुन के
पुण्यम्
पवित्र — पुण्यकारी
हृष्यामि
हर्षित होता हूँ — आनंदित होता हूँ
मुहुर्मुहुः
पल-पल — बार-बार

संजय कहते हैं — हे राजन, केशव और अर्जुन के इस अद्भुत और पवित्र संवाद को बार-बार याद करके मैं पल-पल आनंदित होता हूँ।

यह भाव बहुत सुंदर है — याद करके आनंद। गीता सुनकर आनंद मिला था, पर याद करके भी उतना ही आनंद मिलता है। यही सच्चे ज्ञान का गुण है।

'मुहुर्मुहुः' — पल-पल। यह शब्द आनंद की निरंतरता दर्शाता है। गीता का आनंद एक बार का नहीं — जब भी याद करो, फिर से मिलता है।

अगला श्लोक (18.77) भगवान के विराट-रूप की स्मृति से आनंद की बात करेगा।

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