भगवान अर्जुन से पूछते हैं — हे पार्थ, क्या यह एकाग्र मन से सुना? हे धनंजय, क्या अज्ञान से उत्पन्न तुम्हारा भ्रम नष्ट हुआ?
यह एक गुरु का प्रेमपूर्ण प्रश्न है। इतना सब कहा — पर सुनने वाले तक पहुँचा कि नहीं? गीता का शिक्षण यहाँ एक पड़ाव पर आकर पूछता है — 'समझे?'