📿 श्लोक संग्रह

इदं ते नातपस्काय

गीता 18.67 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन ।
न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥
इदम्
यह — गीता का ज्ञान
न अतपस्काय
तपहीन को नहीं
न अभक्ताय
भक्तिहीन को नहीं
कदाचन
कभी भी नहीं
न अशुश्रूषवे
सुनने की इच्छा न रखने वाले को नहीं
न च माम् अभ्यसूयति
जो मेरी निंदा करता है उसे नहीं

भगवान कहते हैं — यह गीता का ज्ञान उसे कभी मत सुनाओ जो तपहीन हो, जो भक्तिहीन हो, जो सुनना न चाहता हो, और जो मेरी निंदा करता हो।

यह निषेध प्रेम से है — गीता का ज्ञान बहुमूल्य है। अनुपयुक्त स्थान पर देने से उसकी गरिमा कम होती है और सुनने वाले का अहित होता है।

प्राचीन परंपरा में ज्ञान को पात्र व्यक्ति को ही दिया जाता था। 'पात्र' का अर्थ — जो ग्रहण कर सके, जो सुनना चाहे।

यह श्लोक गीता के प्रचार का नहीं, बल्कि गीता की सुरक्षा का वचन है। अगला श्लोक (18.68) उसकी महिमा बताएगा जो इसे सुनाए।

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