📿 श्लोक संग्रह

सर्वगुह्यतमं भूयः

गीता 18.64 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः ।
इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् ॥
सर्वगुह्यतमम्
सबसे अधिक गुह्य — परम रहस्य
भूयः
फिर एक बार
परमम् वचः
परम वचन — सर्वश्रेष्ठ बात
इष्टः असि मे
तुम मुझे प्रिय हो
दृढम् इति
दृढ़ता से — निश्चित रूप से
हितम्
कल्याण की बात — हित

भगवान कहते हैं — एक बार और सुनो — यह सबसे परम और गुह्य वचन। क्योंकि तुम मुझे दृढ़ता से प्रिय हो — इसीलिए मैं तुम्हारा हित बताता हूँ।

यह वाक्य बहुत भावुक है। 'इष्टोऽसि मे दृढमिति' — तुम मुझे दृढ़ रूप से प्रिय हो। यह प्रेम का वचन है। भगवान मित्र की तरह बोल रहे हैं।

गीता के अंत में भगवान का यह स्वर बदलता है — ज्ञान-दाता से प्रेम-करने वाले मित्र की ओर। 'प्रिय हो' — यह भगवान का व्यक्तिगत स्वीकार है।

अगला श्लोक (18.65) वह परम वचन है जो भगवान यहाँ कहने वाले हैं।

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