📿 श्लोक संग्रह

इति ते ज्ञानमाख्यातम्

गीता 18.63 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया ।
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥
इति
इस प्रकार
ज्ञानम् आख्यातम्
ज्ञान कहा गया है
गुह्यात् गुह्यतरम्
गुह्य से भी गुह्यतर — रहस्य से भी गहरा रहस्य
विमृश्य
विचार करके — सोच-समझकर
अशेषेण
पूरी तरह — बिना शेष
यथा इच्छसि तथा कुरु
जैसा चाहो वैसा करो

भगवान कहते हैं — इस प्रकार मैंने तुम्हें गुह्य से भी गुह्यतर ज्ञान कहा। अब इसे पूरी तरह विचारो और जैसा चाहो वैसा करो।

यह भगवान की महानता है — वे थोपते नहीं। सारा ज्ञान दिया, पर निर्णय की स्वतंत्रता अर्जुन को दी। 'यथेच्छसि तथा कुरु' — यह मनुष्य की स्वतंत्र इच्छा का सम्मान है।

यह श्लोक गीता के उपदेश की समाप्ति का संकेत है। अगले श्लोक (18.64-65) में भगवान एक और गुह्यतम वचन देंगे।

'गुह्याद्गुह्यतरम्' — इससे गुह्य ज्ञान और नहीं है। गीता का यह सार भाव है।

अध्याय 18 · 63 / 78
अध्याय 18 · 63 / 78 अगला →