📿 श्लोक संग्रह

यदहंकारमाश्रित्य

गीता 18.59 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
यदहंकारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे ।
मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ॥
अहंकारम् आश्रित्य
अहंकार का सहारा लेकर
न योत्स्ये
नहीं लड़ूँगा
इति मन्यसे
ऐसा सोचते हो
मिथ्या एषः
यह मिथ्या है — झूठा है
व्यवसायः
संकल्प — निश्चय
प्रकृतिः
प्रकृति — तुम्हारा स्वभाव
त्वां नियोक्ष्यति
तुम्हें विवश करेगी

भगवान कहते हैं — यदि अहंकार के कारण तुम सोचते हो कि 'नहीं लड़ूँगा' — यह संकल्प मिथ्या है। तुम्हारी प्रकृति — तुम्हारा क्षत्रिय स्वभाव — तुम्हें विवश कर देगी।

यह बहुत गहरा सत्य है। हम जो सोचते हैं 'मैं ऐसा नहीं करूँगा' — अक्सर हमारा स्वभाव हमें वहीं ले जाता है। प्रकृति से बड़ा कोई नहीं।

अर्जुन का अहंकार — 'मैं इन्हें नहीं मारूँगा' — यह देखने में करुणा लगती है, पर वास्तव में यह भ्रम है। उसकी प्रकृति उसे युद्ध की ओर खींचेगी।

यह श्लोक प्रकृति की अनिवार्यता को दर्शाता है। स्वभाव बदलता नहीं — उसे समझकर, उसके साथ, ईश्वर-शरण में चलना पड़ता है।

अध्याय 18 · 59 / 78
अध्याय 18 · 59 / 78 अगला →