📿 श्लोक संग्रह

मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि

गीता 18.58 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि ।
अथ चेत्त्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि ॥
मच्चित्तः
मुझमें चित्त लगाकर
सर्वदुर्गाणि
सब कठिनाइयों को — सब बाधाओं को
मत्प्रसादात्
मेरी कृपा से
तरिष्यसि
पार कर जाएगा
अहंकारात्
अहंकार से
न श्रोष्यसि
नहीं सुनोगे
विनङ्क्ष्यसि
नष्ट हो जाओगे

भगवान कहते हैं — मुझमें चित्त लगाकर, मेरी कृपा से तुम सब बाधाओं को पार कर जाओगे। पर यदि अहंकार के कारण नहीं सुनोगे — तो नाश होगा।

यह श्लोक दो रास्ते दिखाता है — शरण में जाओ, पार उतरो; या अहंकार में रहो, और डूब जाओ। भगवान का प्रेम भी है और सत्य का स्पष्ट कथन भी।

यह श्लोक अर्जुन के लिए व्यक्तिगत है — 'तुम' (यकार)। युद्ध की स्थिति में यह एक सीधा वचन है।

'विनङ्क्ष्यसि' — नष्ट हो जाओगे। यह कठोर शब्द है। भगवान यहाँ कोमलता और दृढ़ता दोनों के साथ बोल रहे हैं।

अध्याय 18 · 58 / 78
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