📿 श्लोक संग्रह

चेतसा सर्वकर्माणि

गीता 18.57 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः ।
बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव ॥
चेतसा
मन से — चित्त से
सर्वकर्माणि
सब कर्म
मयि संन्यस्य
मुझे समर्पित करके
मत्परः
मुझे परम मानने वाला — मुझमें परायण
बुद्धियोगम्
बुद्धि-योग — विवेकयुक्त योग
उपाश्रित्य
आश्रय लेकर
मच्चित्तः
मुझमें चित्त लगाए
सततम् भव
सदा रहो

भगवान का प्रत्यक्ष निर्देश — सब कर्मों को मन से मुझे समर्पित करो, मुझे परम लक्ष्य मानो, बुद्धि-योग का आश्रय लो, और मुझमें चित्त लगाए सदा रहो।

यह चार बातें एक साथ — अर्पण, लक्ष्य, विवेक, और ध्यान। यही पूर्ण भक्ति-कर्मयोग का सार है। सब करो, पर भीतर से मेरे साथ रहो।

'बुद्धि-योग' — यहाँ विवेकपूर्ण योग का आश्रय लेना। केवल भावुकता नहीं — बुद्धि की स्पष्टता के साथ भक्ति।

यह श्लोक गीता 9.34 ('मन्मना भव मद्भक्तो') की याद दिलाता है — वही संदेश यहाँ और गहरे रूप में दोहराया गया है।

अध्याय 18 · 57 / 78
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