📿 श्लोक संग्रह

स्वभावजेन कौन्तेय

गीता 18.60 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा ।
कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत् ॥
स्वभावजेन
स्वभाव से उत्पन्न
निबद्धः
बँधा हुआ
स्वेन कर्मणा
अपने कर्म से
मोहात्
मोह से — भ्रम से
न इच्छसि
नहीं चाहते
अवशः अपि
विवश होकर भी
करिष्यसि
करोगे ही

भगवान और स्पष्ट करते हैं — हे कौन्तेय, तुम अपने स्वभाव से उत्पन्न कर्म से बँधे हो। जो मोह से तुम नहीं करना चाहते — वह भी विवश होकर करोगे।

यह एक बड़ा सत्य है। हम सोचते हैं कि हम स्वतंत्र हैं — पर हमारा स्वभाव, हमारे संस्कार, हमारी प्रकृति — ये सब मिलकर हमें एक दिशा में ले जाते हैं।

यह श्लोक 18.59 का विस्तार है। प्रकृति का नियम बताया जा रहा है — स्वभाव से कोई भाग नहीं सकता।

गीता का उपदेश यह है — स्वभाव से लड़ो मत। उसे समझो, और उसे ईश्वर-अर्पण के साथ जियो। तब वही स्वभाव मुक्ति का साधन बन जाता है।

अध्याय 18 · 60 / 78
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