📿 श्लोक संग्रह

भक्त्या मामभिजानाति

गीता 18.55 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः ।
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ॥
भक्त्या
भक्ति से
माम् अभिजानाति
मुझे पहचानता है — जानता है
यावान् यः च अस्मि
मैं जितना और जो हूँ
तत्त्वतः
तत्त्व से — वास्तव में
ततः
तब — उसके बाद
विशते
प्रवेश करता है
तदनन्तरम्
तत्क्षण — उसी क्षण

भगवान कहते हैं — भक्ति के द्वारा ही कोई मुझे तत्त्व से जान सकता है — मैं जितना और जो हूँ। और उस तत्त्व-ज्ञान के बाद वह तत्क्षण मुझमें प्रवेश कर जाता है।

यह अत्यंत सुंदर और गहरा वचन है। ज्ञान-मार्ग से भी अंत में भक्ति आती है। और भक्ति से जो ज्ञान होता है — वह प्रत्यक्ष, तत्काल अनुभव है।

यह श्लोक गीता 11.54 की ध्वनि है — 'भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन।' भक्ति ही परम ज्ञान का मार्ग है।

'तदनन्तरम् विशते' — तत्क्षण प्रवेश। यह भक्ति की तात्कालिकता है — जब सच्चा ज्ञान होता है, तो मुक्ति उसी क्षण होती है।

अध्याय 18 · 55 / 78
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