ब्रह्म-भूत अवस्था में मनुष्य प्रसन्न रहता है। वह न शोक करता है, न कामना करता है। सब प्राणियों को समान दृष्टि से देखता है। और इस अवस्था में वह मेरी परम भक्ति प्राप्त करता है।
यह श्लोक बहुत सुंदर है — ब्रह्म-ज्ञान के बाद भक्ति। ज्ञान और भक्ति अलग नहीं हैं। जब ज्ञान पूर्ण होता है, तब परम भक्ति स्वाभाविक रूप से आती है।