📿 श्लोक संग्रह

ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा

गीता 18.54 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति ।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ॥
ब्रह्मभूतः
ब्रह्म-भूत — ब्रह्म-अवस्था में स्थित
प्रसन्नात्मा
प्रसन्न आत्मा वाला — शांत चित्त
न शोचति
शोक नहीं करता
न काङ्क्षति
कामना नहीं करता
समः सर्वेषु भूतेषु
सब प्राणियों में समान
मद्भक्तिम् पराम्
मेरी परा-भक्ति
लभते
पाता है

ब्रह्म-भूत अवस्था में मनुष्य प्रसन्न रहता है। वह न शोक करता है, न कामना करता है। सब प्राणियों को समान दृष्टि से देखता है। और इस अवस्था में वह मेरी परम भक्ति प्राप्त करता है।

यह श्लोक बहुत सुंदर है — ब्रह्म-ज्ञान के बाद भक्ति। ज्ञान और भक्ति अलग नहीं हैं। जब ज्ञान पूर्ण होता है, तब परम भक्ति स्वाभाविक रूप से आती है।

गीता में पहले ज्ञान-योग और भक्ति-योग अलग लगते थे। यहाँ 18.54 में वे एक हो जाते हैं। ब्रह्म-ज्ञान ही परा-भक्ति का द्वार है।

अगला श्लोक (18.55) भक्ति के माध्यम से भगवान को जानने की बात करेगा।

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