साधना का अंतिम चरण — अहंकार, बल का अभिमान, घमंड, काम, क्रोध और संग्रह-प्रवृत्ति — इन छह को छोड़कर, ममता-रहित और शांत होकर व्यक्ति ब्रह्म-भाव के योग्य बनता है।
यह एक पूर्ण जीवन-रूपांतरण का वर्णन है। तीन श्लोकों (18.51-53) में जो साधनाएँ बताई गईं, उनका अंतिम फल है — 'ब्रह्मभूय' — ब्रह्म बन जाना।