📿 श्लोक संग्रह

अहंकारं बलं दर्पम्

गीता 18.53 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् ।
विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥
अहंकारम्
अहंकार — मैं-पन
बलम्
शक्ति का अहंकार
दर्पम्
दर्प — घमंड
कामम्
काम — इच्छा
क्रोधम्
क्रोध
परिग्रहम्
परिग्रह — संग्रह की प्रवृत्ति
निर्ममः
ममता-रहित — 'मेरा' न कहने वाला
ब्रह्मभूयाय
ब्रह्म-भाव को — ब्रह्म बनने को
कल्पते
योग्य होता है

साधना का अंतिम चरण — अहंकार, बल का अभिमान, घमंड, काम, क्रोध और संग्रह-प्रवृत्ति — इन छह को छोड़कर, ममता-रहित और शांत होकर व्यक्ति ब्रह्म-भाव के योग्य बनता है।

यह एक पूर्ण जीवन-रूपांतरण का वर्णन है। तीन श्लोकों (18.51-53) में जो साधनाएँ बताई गईं, उनका अंतिम फल है — 'ब्रह्मभूय' — ब्रह्म बन जाना।

'परिग्रह' — इकट्ठा करने की प्रवृत्ति — यह अंतिम बाधा है। अहंकार की तरह परिग्रह भी 'मेरेपन' से उपजता है।

ये तीन श्लोक मिलकर गीता के ब्रह्म-मार्ग का संपूर्ण रोडमैप हैं। अगला श्लोक (18.54) ब्रह्म-भूत की अवस्था का वर्णन करेगा।

अध्याय 18 · 53 / 78
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