📿 श्लोक संग्रह

बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो

गीता 18.51 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च ।
शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ॥
बुद्ध्या विशुद्धया
शुद्ध बुद्धि से
युक्तः
युक्त — सम्पन्न
धृत्या
धृति से — दृढ़ता से
आत्मानम् नियम्य
आत्मा को नियंत्रित करके
शब्दादीन् विषयान्
शब्द आदि विषयों को
रागद्वेषौ
राग और द्वेष
व्युदस्य
हटाकर — दूर करके

ब्रह्म-भाव की साधना के लिए पहले चार कदम — शुद्ध बुद्धि से युक्त होना, धृति से आत्मा को वश में करना, शब्द-स्पर्श-रूप जैसे इंद्रिय-विषयों को छोड़ना, और राग-द्वेष को दूर करना।

यह श्लोक एक क्रमिक साधना का आरंभ है। पहले भीतर को शुद्ध करो, फिर इंद्रियों को साधो, फिर राग-द्वेष हटाओ। यही ब्रह्म-मार्ग की तैयारी है।

ये साधनाएँ 18.51-53 में तीन श्लोकों में वर्णित हैं। यह पहला श्लोक बाहरी और भीतरी त्याग की बात करता है।

'रागद्वेषौ व्युदस्य' — राग और द्वेष हटाना — यह गीता 3.34 से जुड़ता है जहाँ इंद्रिय-विषयों में राग-द्वेष को बड़ा शत्रु बताया गया था।

अध्याय 18 · 51 / 78
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