📿 श्लोक संग्रह

यज्ञदानतपःकर्म

गीता 18.5 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् ।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥
यज्ञदानतपःकर्म
यज्ञ, दान और तप के कर्म
न त्याज्यम्
नहीं छोड़ने चाहिए
कार्यम् एव
अवश्य करने चाहिए
पावनानि
पवित्र करने वाले
मनीषिणाम्
ज्ञानी पुरुषों को

भगवान स्पष्ट करते हैं — यज्ञ, दान और तप — इन्हें कभी नहीं छोड़ना चाहिए। ये तीनों कर्म ज्ञानी पुरुषों को पवित्र करते हैं। ये बाहरी क्रियाएँ नहीं, बल्कि जीवन को शुद्ध बनाने के साधन हैं।

यज्ञ का अर्थ है — किसी उद्देश्य के लिए समर्पित कर्म। दान का अर्थ है — बिना स्वार्थ के देना। तप का अर्थ है — अनुशासन के साथ जीना। ये तीनों गुण मिलकर मनुष्य को भीतर से सुंदर बनाते हैं।

यह श्लोक उन लोगों के लिए उत्तर है जो सोचते हैं कि संन्यास का अर्थ सब कुछ छोड़ देना है। गीता कहती है — यज्ञ, दान और तप जैसे कर्म छोड़ने की वस्तु नहीं हैं।

ये तीनों कर्म वैदिक परंपरा में गृहस्थ जीवन के आधार माने जाते हैं। गीता इन्हें त्याग की श्रेणी से बाहर रखती है।

अध्याय 18 · 5 / 78
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