📿 श्लोक संग्रह

निश्चयं शृणु मे

गीता 18.4 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम ।
त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः ॥
निश्चयम्
निश्चित मत — दृढ़ निर्णय
शृणु
सुनो
भरतसत्तम
भरतवंशियों में श्रेष्ठ — अर्जुन
त्यागः
त्याग
पुरुषव्याघ्र
पुरुषों में सिंह — वीर अर्जुन
त्रिविधः
तीन प्रकार का

भगवान कहते हैं — 'हे भरतश्रेष्ठ, इस विषय में मेरा निश्चित मत सुनो।' वे स्पष्ट करते हैं कि त्याग तीन प्रकार का होता है। यहाँ वे सीधे उत्तर देने की मुद्रा में हैं।

यह श्लोक एक शिक्षक की तरह है जो कहता है — 'अब मैं बताता हूँ, ध्यान से सुनो।' अगले कई श्लोकों में तीन प्रकार के त्याग को विस्तार से समझाया जाएगा।

गीता में जब भगवान 'निश्चय' शब्द कहते हैं, तो यह उनके प्रत्यक्ष उपदेश का संकेत होता है। यहाँ वे दोनों पक्षों की बहस को समाप्त कर अपना स्पष्ट उत्तर देते हैं।

त्याग की त्रिविध व्याख्या — सात्त्विक, राजस और तामस — इसके बाद के श्लोकों में आती है।

अध्याय 18 · 4 / 78
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