📿 श्लोक संग्रह

त्याज्यं दोषवदित्येके

गीता 18.3 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः ।
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे ॥
त्याज्यम्
छोड़ने योग्य
दोषवत्
दोषपूर्ण — बुराई की तरह
मनीषिणः
विचारशील पुरुष — विद्वान
यज्ञदानतपःकर्म
यज्ञ, दान और तप के कर्म
न त्याज्यम्
नहीं छोड़ना चाहिए
अपरे
दूसरे — अन्य विचारक

भगवान बताते हैं कि इस विषय पर दो मत चले आते हैं। एक वर्ग कहता है — सब कर्म दोषपूर्ण हैं, इन्हें छोड़ दो। दूसरा वर्ग कहता है — यज्ञ, दान और तप जैसे कर्म कभी नहीं छोड़ने चाहिए। इस मतभेद को यहाँ प्रस्तुत किया गया है।

यह श्लोक एक दार्शनिक बहस को सामने रखता है। भगवान खुद अगले श्लोकों में इस पर अपना निश्चित मत देंगे। पहले प्रश्न उठाना, फिर उत्तर देना — यह गीता की शिक्षण-शैली है।

यह श्लोक उस वाद-विवाद को दर्शाता है जो प्राचीन भारत के विभिन्न दार्शनिक संप्रदायों में था। गीता यहाँ संतुलित दृष्टिकोण अपनाती है।

अगले श्लोक में भगवान कहेंगे — 'मेरा निश्चित मत सुनो।' यह श्लोक उस उत्तर की भूमिका है।

अध्याय 18 · 3 / 78
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