📿 श्लोक संग्रह

काम्यानां कर्मणां

गीता 18.2 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः ।
सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ॥
काम्यानाम्
कामना से किए जाने वाले
कर्मणाम्
कर्मों का
न्यासम्
त्याग — छोड़ना
संन्यासम्
संन्यास
कवयः
ज्ञानी पुरुष — मेधावी
सर्वकर्मफलत्यागम्
सब कर्मों के फल का त्याग
विचक्षणाः
बुद्धिमान — विद्वान

भगवान कहते हैं — ज्ञानी पुरुष 'संन्यास' उसे कहते हैं जब कामना से प्रेरित कर्म छोड़ दिए जाएँ। और 'त्याग' उसे कहते हैं जब सब कर्म करते हुए उनके फल की आसक्ति छोड़ दी जाए। दोनों में अंतर है — एक कर्म छोड़ना है, दूसरा फल की चाहत छोड़ना।

यह परिभाषा बहुत व्यावहारिक है। हर घर में काम करना पड़ता है — खाना बनाना, दफ्तर जाना, बच्चों की देखभाल करना। गीता कहती है — ये कर्म करो, पर फल की चाहत मत रखो। यही असली त्याग है।

यह श्लोक गीता की दो केंद्रीय अवधारणाओं को परिभाषित करता है। आगे के श्लोकों में भगवान इन्हीं पर विस्तार करेंगे।

संन्यास और त्याग का यह भेद गीता की मौलिक शिक्षा है — कर्म से भागना नहीं, बल्कि फल की आसक्ति से मुक्त होकर कर्म करना।

अध्याय 18 · 2 / 78
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