भगवान कहते हैं — ज्ञानी पुरुष 'संन्यास' उसे कहते हैं जब कामना से प्रेरित कर्म छोड़ दिए जाएँ। और 'त्याग' उसे कहते हैं जब सब कर्म करते हुए उनके फल की आसक्ति छोड़ दी जाए। दोनों में अंतर है — एक कर्म छोड़ना है, दूसरा फल की चाहत छोड़ना।
यह परिभाषा बहुत व्यावहारिक है। हर घर में काम करना पड़ता है — खाना बनाना, दफ्तर जाना, बच्चों की देखभाल करना। गीता कहती है — ये कर्म करो, पर फल की चाहत मत रखो। यही असली त्याग है।