भगवान कहते हैं — जिसकी बुद्धि सब जगह अनासक्त है, जिसने स्वयं को जीत लिया है, जो इच्छाओं से रहित है — वह संन्यास के द्वारा परम नैष्कर्म्य-सिद्धि प्राप्त करता है।
नैष्कर्म्य का अर्थ है — कर्म करते हुए भी कर्म से अलिप्त रहना। यह सिद्धि का सर्वोच्च रूप है। इसे संन्यास — मन और बुद्धि के त्याग — से प्राप्त किया जाता है।