📿 श्लोक संग्रह

शमो दमस्तपः शौचम्

गीता 18.42 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च ।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ॥
शमः
मन का संयम
दमः
इंद्रिय-संयम
तपः
तपस्या — अनुशासन
शौचम्
शुद्धता — पवित्रता
क्षान्तिः
क्षमा — सहनशीलता
आर्जवम्
सरलता — सीधापन
आस्तिक्यम्
आस्तिकता — परमात्मा में विश्वास
स्वभावजम्
स्वभाव से उत्पन्न

ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं — मन का संयम, इंद्रिय-संयम, तपस्या, पवित्रता, क्षमा, सरलता, ज्ञान, विज्ञान (अनुभव-ज्ञान) और ईश्वर में आस्था। ये नौ गुण ब्राह्मण-धर्म के आधार हैं।

ये गुण किसी जाति की संपत्ति नहीं — ये स्वभाव के गुण हैं। जिस व्यक्ति में ये गुण हों, वह ब्राह्मण-कर्म करने योग्य है। यह गीता की दृष्टि है।

'ज्ञान' और 'विज्ञान' — यहाँ ज्ञान शास्त्र-ज्ञान है और विज्ञान अनुभव-ज्ञान। दोनों मिलकर पूर्ण ज्ञान बनते हैं।

'आस्तिक्य' — परमात्मा की सत्ता में विश्वास — यह ब्राह्मण-कर्म का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण गुण है।

अध्याय 18 · 42 / 78
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