📿 श्लोक संग्रह

ब्राह्मणक्षत्रियविशां

गीता 18.41 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परंतप ।
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः ॥
ब्राह्मणक्षत्रियविशाम्
ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के
शूद्राणाम् च
और शूद्रों के भी
कर्माणि
कर्म — कर्तव्य
प्रविभक्तानि
विभाजित हैं — बाँटे गए हैं
स्वभावप्रभवैः
अपने स्वभाव से उत्पन्न
गुणैः
गुणों से — सत्त्व-रज-तमस से

भगवान कहते हैं — ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के कर्म स्वभाव से उत्पन्न गुणों के अनुसार विभक्त हैं। यह विभाजन जन्म से नहीं, बल्कि प्रकृति और गुणों से है।

गीता यहाँ यह स्पष्ट करती है — हर व्यक्ति का कर्म उसके स्वभाव से निर्धारित होता है। यह स्वभाव गुणों का परिणाम है। इसीलिए अपने स्वभाव के अनुसार कर्म करना श्रेष्ठ है।

गीता में वर्ण-व्यवस्था को गुण और कर्म के आधार पर देखा गया है — जन्म के आधार पर नहीं। यही गीता 4.13 में भी कहा गया था।

अगले श्लोकों (18.42-44) में चारों वर्णों के विशिष्ट कर्म बताए जाएँगे।

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