📿 श्लोक संग्रह

न तदस्ति पृथिव्यां वा

गीता 18.40 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः ।
सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः ॥
न तत् अस्ति
वह नहीं है — ऐसा कोई नहीं
पृथिव्याम्
पृथ्वी पर
दिवि देवेषु
स्वर्ग में देवताओं में
सत्त्वम्
प्राणी — सत्ता
प्रकृतिजैः
प्रकृति से उत्पन्न
त्रिभिः गुणैः
तीन गुणों से
मुक्तम्
मुक्त — स्वतंत्र

भगवान गुण-विवेचन का समापन इस महान कथन से करते हैं — न पृथ्वी पर, न स्वर्ग में देवताओं में — कोई भी ऐसा प्राणी नहीं जो प्रकृति के इन तीन गुणों से मुक्त हो।

यह बहुत बड़ी बात है। देवता भी गुणों से बंधे हैं। इसीलिए गीता में गुणों से ऊपर उठने की — 'त्रिगुणातीत' होने की — शिक्षा दी जाती है।

गीता के चौदहवें अध्याय में गुणों का विस्तृत वर्णन था। वहाँ भी यही कहा गया था कि प्रकृति से जन्मा हर प्राणी गुणों से बँधा है।

यह श्लोक गुण-विवेचन खंड का अंतिम श्लोक है। अगले श्लोक (18.41) से वर्ण-धर्म का वर्णन शुरू होगा।

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