सात्त्विक सुख पहले कठिन लगता है — जैसे विष। साधना, अनुशासन, ध्यान — ये शुरू में कठिन होते हैं। पर अंत में यही सुख अमृत जैसा मीठा हो जाता है।
आत्म-बुद्धि की प्रसन्नता — यही सात्त्विक सुख का स्रोत है। यह इंद्रियों से नहीं, भीतर से आता है। इसीलिए यह टिकाऊ है।