राजस सुख सात्त्विक से ठीक उल्टा है। इंद्रियों और विषयों के मेल से जो सुख मिलता है — वह पहले अमृत जैसा लगता है। पर अंत में वह विष जैसा बन जाता है।
यह अनुभव बहुत सामान्य है। स्वादिष्ट भोजन, मनोरंजन, भौतिक सुविधाएँ — पहले आनंद देती हैं, पर बाद में लत, अतृप्ति या दुःख लाती हैं। यही राजस सुख का स्वभाव है।