📿 श्लोक संग्रह

विषयेन्द्रियसंयोगात्

गीता 18.38 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् ।
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥
विषयेन्द्रियसंयोगात्
विषय और इंद्रिय के संयोग से
अग्रे अमृतोपमम्
पहले अमृत जैसा
परिणामे विषम् इव
अंत में विष जैसा
राजसम्
राजस — रजोगुण से युक्त
स्मृतम्
कहा गया है — माना जाता है

राजस सुख सात्त्विक से ठीक उल्टा है। इंद्रियों और विषयों के मेल से जो सुख मिलता है — वह पहले अमृत जैसा लगता है। पर अंत में वह विष जैसा बन जाता है।

यह अनुभव बहुत सामान्य है। स्वादिष्ट भोजन, मनोरंजन, भौतिक सुविधाएँ — पहले आनंद देती हैं, पर बाद में लत, अतृप्ति या दुःख लाती हैं। यही राजस सुख का स्वभाव है।

सात्त्विक सुख की तुलना में राजस सुख उल्टा है — पहले अमृत, फिर विष। इसीलिए गीता इंद्रियों के विषयों में अत्यधिक आसक्ति से बचने की शिक्षा देती है।

अगले श्लोक (18.39) में तामस सुख का वर्णन आएगा।

अध्याय 18 · 38 / 78
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