📿 श्लोक संग्रह

यत्तदग्रे विषमिव

गीता 18.37 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् ।
तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् ॥
अग्रे
पहले — आरंभ में
विषम् इव
विष की तरह
परिणामे
परिणाम में — अंत में
अमृतोपमम्
अमृत के समान
आत्मबुद्धिप्रसादजम्
आत्मा और बुद्धि की प्रसन्नता से उत्पन्न
सात्त्विकम्
सात्त्विक

सात्त्विक सुख पहले कठिन लगता है — जैसे विष। साधना, अनुशासन, ध्यान — ये शुरू में कठिन होते हैं। पर अंत में यही सुख अमृत जैसा मीठा हो जाता है।

आत्म-बुद्धि की प्रसन्नता — यही सात्त्विक सुख का स्रोत है। यह इंद्रियों से नहीं, भीतर से आता है। इसीलिए यह टिकाऊ है।

यह सुंदर विरोधाभास है — जो पहले विष लगे, वह अमृत निकले। यह आध्यात्मिक साधना का अनुभव है।

सात्त्विक सुख का स्रोत 'आत्मबुद्धिप्रसाद' है — यानी भीतरी शुद्धता से उत्पन्न आनंद। यह बाहरी वस्तुओं पर निर्भर नहीं।

अध्याय 18 · 37 / 78
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