भगवान कहते हैं — हे भरतर्षभ, सुख भी तीन प्रकार का है। वह सुख जिसमें अभ्यास से रमण होता है और जो दुःख के अंत तक ले जाता है — वह सुनो।
यह श्लोक एक महत्वपूर्ण बात कहता है — असली सुख वह है जो दुःख का अंत करे। बाहरी सुख दुःख बढ़ाता है। भीतरी सुख — जो साधना से मिलता है — वह दुःख घटाता है।