📿 श्लोक संग्रह

सुखं त्विदानीं त्रिविधम्

गीता 18.36 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ ।
अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति ॥
सुखम् त्रिविधम्
तीन प्रकार का सुख
शृणु मे
मुझसे सुनो
भरतर्षभ
भरतवंशियों में श्रेष्ठ — अर्जुन
अभ्यासात्
अभ्यास से — साधना से
रमते
रमण करता है — आनंद पाता है
दुःखान्तम्
दुःख का अंत
निगच्छति
पहुँचता है — प्राप्त होता है

भगवान कहते हैं — हे भरतर्षभ, सुख भी तीन प्रकार का है। वह सुख जिसमें अभ्यास से रमण होता है और जो दुःख के अंत तक ले जाता है — वह सुनो।

यह श्लोक एक महत्वपूर्ण बात कहता है — असली सुख वह है जो दुःख का अंत करे। बाहरी सुख दुःख बढ़ाता है। भीतरी सुख — जो साधना से मिलता है — वह दुःख घटाता है।

सुख की तीन श्रेणियाँ 18.36-39 में वर्णित हैं। यह श्लोक उनकी भूमिका है।

'दुःखान्तं च निगच्छति' — यह वाक्यांश सात्त्विक सुख की परिभाषा का सूत्र है। जो सुख दुःख का अंत करे, वही श्रेष्ठ सुख है।

अध्याय 18 · 36 / 78
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