📿 श्लोक संग्रह

यया स्वप्नं भयं शोकम्

गीता 18.35 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च ।
न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी ॥
स्वप्नम्
नींद — सुषुप्ति
भयम्
भय — डर
शोकम्
शोक — दुःख
विषादम्
विषाद — उदासी
मदम्
मद — नशा, अहंकार
न विमुञ्चति
नहीं छोड़ता
दुर्मेधाः
मंद बुद्धि वाला — मूढ़
तामसी
तामस धृति

तामस धृति वह है जो मूढ़ को नींद, भय, शोक, विषाद और मद — इन सबसे नहीं छोड़ती। यह दृढ़ता नहीं, यह जड़ता है — इन्हीं में बंधे रहना।

यह दृढ़ता उल्टी दिशा में काम करती है। वह जिसे छोड़ना चाहिए, उसे छोड़ने नहीं देती। इसीलिए यह तामस — अंधकारमय — धृति है।

धृति की तीन श्रेणियाँ यहाँ समाप्त होती हैं। सात्त्विक — योग में थामती है। राजस — फल के लिए थामती है। तामस — बुराइयों को नहीं छोड़ती।

अगले श्लोकों (18.36-39) में सुख के तीन प्रकार का वर्णन आएगा।

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