📿 श्लोक संग्रह

यया धर्ममधर्मं च

गीता 18.31 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च ।
अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी ॥
धर्मम् अधर्मम् च
धर्म और अधर्म को
कार्यम् अकार्यम्
करने योग्य और न करने योग्य को
अयथावत्
ठीक से नहीं — उल्टा-सीधा
प्रजानाति
जानती है — समझती है
राजसी
राजस बुद्धि

राजस बुद्धि वह है जो धर्म-अधर्म और करने-न करने योग्य को ठीक से नहीं जानती — यानी यह सब जानती तो है, पर गलत-सलत ढंग से। उसकी समझ अधूरी और भ्रामक होती है।

राजस बुद्धि वाला व्यक्ति 'जानता' है — पर वह ज्ञान पूरी तरह विश्वसनीय नहीं। कभी-कभी सही, कभी-कभी गलत। इसीलिए उसके निर्णय कभी सटीक नहीं होते।

सात्त्विक बुद्धि निश्चित जानती है। राजस बुद्धि अनिश्चित जानती है — इसीलिए उसके निर्णयों में उतार-चढ़ाव होता है।

यह बुद्धि की दूसरी श्रेणी है। अगले श्लोक में तामस बुद्धि का वर्णन आएगा।

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