भगवान बताते हैं कि इस विषय पर दो मत चले आते हैं। एक वर्ग कहता है — सब कर्म दोषपूर्ण हैं, इन्हें छोड़ दो। दूसरा वर्ग कहता है — यज्ञ, दान और तप जैसे कर्म कभी नहीं छोड़ने चाहिए। इस मतभेद को यहाँ प्रस्तुत किया गया है।
यह श्लोक एक दार्शनिक बहस को सामने रखता है। भगवान खुद अगले श्लोकों में इस पर अपना निश्चित मत देंगे। पहले प्रश्न उठाना, फिर उत्तर देना — यह गीता की शिक्षण-शैली है।