📿 श्लोक संग्रह

पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानम्

गीता 18.21 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग
पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान् ।
वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम् ॥
पृथक्त्वेन
भेद-भाव से — अलगाव की दृष्टि से
नानाभावान्
अनेक-अनेक भावों को
पृथग्विधान्
विभिन्न प्रकार के
वेत्ति
जानता है — देखता है
सर्वेषु भूतेषु
सब प्राणियों में
राजसम्
राजस — रजोगुण से युक्त

राजस ज्ञान वह है जो सब भूतों में भेद-भाव से अनेक-अनेक और भिन्न-भिन्न भावों को देखता है। यह ज्ञान विविधता तो देखता है, पर उस विविधता के पीछे की एकता नहीं पकड़ पाता।

हम जब किसी को 'वह अलग है, मैं अलग हूँ' — इस दृष्टि से देखते हैं, तो यह राजस ज्ञान है। यह गलत नहीं है — पर अधूरा है। इसमें सब दिखता है, पर मूल नहीं दिखता।

सात्त्विक ज्ञान (18.20) एकता देखता था। राजस ज्ञान अनेकता देखता है। दोनों में अंतर यह है — एक में एकता है, दूसरे में विखंडन।

यह विभाजन व्यावहारिक है — हम जितना अधिक भेद-भाव से देखेंगे, उतना अधिक संघर्ष होगा। एकता की दृष्टि ही शांति का मार्ग है।

अध्याय 18 · 21 / 78
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